Sunday, 26 February, 2012

होती बन्दरबांट

सिफारिश बिना कब मिले, किसी को पुरस्कार |
होती बन्दरबांट है , हो ऐसा हर बार ||
हो ऐसा हर बार , छूट रहे बुद्धिजीवी |
बना हुआ आधार , बाप, भाई या बीवी ||
मिलेगा पुरस्कार , न पालना कभी ख्वाहिश |
कहे विर्क कविराय , नहीं है अगर सिफारिश ||

* * * * *

17 comments:

  1. सिफ़र सिफ़ारिश में जुड़ा, ज़ीरो से क्या रीस ।

    हीरो आलू छीलता, घर का बन्दा बीस ।



    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

    http://dineshkidillagi.blogspot.in

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  2. आपकी व्यथा ,पीड़ा का अंदाज है मुझे , निष्ठा व समर्पण में निरंतर गिरावट तब आती है जब विश्वास जगह ले लेता है की श्रम का कोई उचित मूल्य ,निष्ठा का सार्थक अर्थ नहीं निकलने वाला है / किसी को एक ही पुरस्कार दो बार मिलता है , कोई अज्ञात बन कर रह जाता है , मूल्यवान सृजन मात्र पाण्डुलिपि बनकर अज्ञात रह जाते हैं ,प्रकाशक नहीं मिलता ,/ भारतीय मेधा ,सृजन, क्या इतनी बौनी है की आज अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्थान नहीं बना पा रही है ,कारन है विभेद पक्षपात कुंठा ......... आज भी हम वहीँ हैं जहाँ पहले खड़े थे /आपकी भावनाओं की क़द्र करते हुए -
    बस अक्ल की कमी है,बे-अक्ल होने के लिए
    ताजदारों की सूरत , ताजदार से नहीं मिलती-
    धन्यवाद जी विरक साहब .../

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  3. तुलसी बाबा की नीति सफल है 'स्वान्त: सुखाय रघुनाथगाथा'

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  4. सुंदर प्रस्तुति । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 27-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  6. बहु सही बात ... कुंडली के माध्यम से

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  7. सुन्दर सृजन ,
    सार्थक पोस्ट, आभार.

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  8. अति उत्तम,सराहनीय कुंडलियाँ,...सार्थक प्रस्तुति

    NEW POST काव्यान्जलि ...: चिंगारी...

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  9. अच्छी प्रस्तुति |
    आशा

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  10. सटीक मूल्याङ्कन

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  11. सार्थक प्रस्तुति ....

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